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Wednesday, February 8, 2012

नदी के पार....

नदी के पार कोई गाता गीत 
उस स्वर में बसा है मन का मीत 
नदी की लहरों खेतों से उठकर 
आती ध्वनि मन लेता जीत 

होगा इस पार जो लेगा सुन 
इस देहाती गानों का उधेड़-बुन 
इन एकाकी गानों को सुनकर 
मरकर भी जी लेगा पुन-पुन 

भानु-चन्द्र का है आलिंगन 
प्रकाश से भरा है लालिमांगन 
इन गीतों ने छेड़ा है फिर से 
राग-अनुराग का आलापन 

Tuesday, October 25, 2011

मेरी गली से

मेरी गली से जब भी गुजरीं वो
खुशबू का सैलाब सा बह गया
रूह तक पहुंची वो खुशबू-ए-उल्फत
मुहब्बत का तकाजा बढ़ गया
दिल के दामन में आकर
धूम मचाकर रख दिया
सपनो में भी चैन न आया
वो आयी और मै दीवाना हो गया
इश्क जब सर पर चढ़ा
वो बेवफा चिड़िया सी फुर्र हुई
अब तो ये हाल है जानम
मालूम नहीं कब दिन हुआ कब रात हुई

Saturday, July 16, 2011

ज़िन्दगी से ....



ज़िन्दगी  से बस यूं ही
 चन्द बातें हुई
 चमन में आये बहार से
 एक मुलाकात हुई

 जलते चिरागों तले
 रोशनी नहीं होती
 चिराग  तले अँधेरे में
 ज़िन्दगी दीदार हुई

 हर तरफ भीड़ है
 हर शख्स है परेशान
इस दुनिया  में ज़िन्दगी
 तू ही है तनहा खडी

Monday, April 18, 2011

बात ...दिल की


घुप्प रात का अँधेरा 
परछाई का नहीं नामोनिशाँ
फिर ये साया कौन? 
जो मेरा हमराही है बन रहा 

तुझसे बिछड़कर मरने का 
कोई इरादा तो नही 
इश्क किया है तुझसे 
पर इतना बेपनाह तो नही 

एकटक सितारों को क्यों देखते हो 
इन सितारों से मिलने का तमन्ना तो नहीं ?





Tuesday, March 29, 2011

तेरी यादों में ...









आँखों में आंसूं भरे है तेरी यादों में
हलक से पानी न उतरा तेरी यादों में 
हर आहट तेरे आने का आस जगाये 
भरी महफ़िल से हम उठकर चले आये 
                                           तेरी यादों में 
दिल का दर्द नासूर बन गया तेरी यादों में 
बह रही है आंसूओं की धार तेरी यादों में 
टूटा जो नाज़ुक दिल जुड़ न पाया 
रग-रग टूटा जाए तेरी यादों में 






Friday, March 18, 2011

यारा लगा मन


यारा लगा मन फकीरी में 
न डर खोने का 
न खुशी कुछ पाने का 
ये जहां है अपना 
बीते न दिन गरीबी में 

यारा लगा मन फकीरी में 

जब से लागी लगन उस रब से 
मन बैरागी सा हो गया 
पथ-पथ घूमूं ढूंडू पिया को 
ये फकीरा काफ़िर बन गया 

मन फकीरा ये जान न पाए 
आखिर उसे जाना है कहाँ 
रब दे वास्ते ढूंडन लागी 
रास्ता-रास्ता गलियाँ-गलियाँ 

क्या करूँ कुछ समझ न आये 
उस रब दे मिलने के वास्ते 
ढूँढ लिया सब ठौर-ठिकाने 
गली,कूचे और रास्ते 

जाने कब जुड़ेगा नाता 
और ये फकीर तर जावेगा 
सूख गयी आँखे ये देखन वास्ते 
रब ये मिलन कब करवावेगा
 ..

Saturday, February 26, 2011

साजन तुम कब आओगे


साजन तुम कब आओगे
.
तुम्हारे कदमो की हल्की सी आहट से
  ये दिल परेशां हुआ
टूट न जाए ये प्यार के धागे
  मतवारा ये प्यार हुआ
.
तुम कब समझ पाओगे
साजन तुम कब आओगे
.
चाहे सांझ हो या चाहे सवेरा
   ये मन धडका जाए
तुम तो सजन नींदों से सोये
  हाय! मुझे नींद न आये
.
तुमने प्यार छुपाया लेकिन
  मुझ से न छुप पाया
मेरे मन की अन्धकार में
  प्यार का दीया जलाया
.
सावन की बदरी तुम बनकर
कब मन को तर जाओगे
साजन तुम कब आओगे

Tuesday, February 8, 2011

कविता रच डाली

Storm Watch


आसमान में बादल छाया
छुप गया सूरज शीतल छाया
मेरे इस उद्वेलित मन ने
          कविता रच डाली

ठंडी हवा का झोंका आया
कारी बदरी मन भरमाया
मन-मयूर ने पंख फैलाकर
          कविता रच डाली

गीली मिटटी की खुश्बू से
श्यामल-श्यामल सी धरती से
मन के अन्दर गीत जागा और
            कविता रच डाली

ये धरती ये कारी बदरी
मन को भरमाती ये नगरी
उद्वेलित कर गयी इस मन को और मैंने
             कविता रच डाली

Friday, January 14, 2011

जाह्नवी हूँ .........

   मै नदी हूँ .............
पहाड़ो से निकली 
नदों से मिलती 
कठिन धरातल पर              
उफनती उछलती 
प्रवाह तरंगिनी हूँ 
                          

Saturday, December 18, 2010

आंसुओं की झड़ी.........


आंसुओं की झड़ी लगी
कहीं समंदर न बन जाए
टूटा दिल बिखर गया पल
दर्द-ए-दिल से जीया न जाए

Saturday, December 4, 2010

दिन तो बदलते है

दिन तो बदलते है
जीते है मरते है
अपनी इस दुनिया में
पल पल फिसलते है

क्षण-भंगुर ये काया
भटकाती है माया
मन के इस भटकन से
बारम्बार छलते है

Monday, November 15, 2010

तृष्णा

इन  बारिश की बूंदों को 
तन  से लिपटने  दो 
प्यासे इस चातक का 
अंतर्मन तरने दो 


बरसो की चाहत है 
बादल में ढल जाऊं 
पर आब-ओ-हवा के 
फितरत को समझने दो 

Saturday, November 13, 2010

स्वर्ग सिधारन हो कैसे

shiv
इस मलिन देह में ईश्वर का वास हो कैसे
झूठ-कपट भरे जिह्वा से ईश्वर का नाम हो कैसे
प्रपंचों में पडा इस मन से ईश्वर का ध्यान हो कैसे
बुराई को देखती इन नयनो से ईश्वर दर्शन हो कैसे

Sunday, November 7, 2010

नि:शब्द


खामोश हम तुम
बात ज़िन्दगी से
आँखों ने कुछ कहा
धड़कन सुन रही है

धरती से अम्बर तक
नि:शब्द संगीत है
मौसम की शोखियाँ भी
आज चुप-चुप सी है

गीत भी दिल से
होंठ तक न आ पाए
बात दिल की
दिल में ही रह जाए
.
जिस्मो की खुशबू ने
पवन महकाया है
खामोशी को ख़ामोशी ने
चुपके से बुलाया है
.
प्यार की बातों को
अबोला ही रहने दो
नि:शब्द इस गूँज को
शब्दों में न ढलने दो
.
प्यार के भावो को
शब्दों में मत बांधो
चुपके से इस दिल से
संगीत का स्वर बांधो
.
स्वर ही है इस मन के
भावो को है दर्शाती
प्यार जो चुप चुप है
जुबां से निकल आती

Saturday, October 23, 2010

सुन्दर ये मुखड़ा.............



सुन्दर ये मुखड़ा
चाँद का टुकडा
नयन विशाल है
अधर कोमल
————–
कटिबंध अनुपम
वलय निरूपम
कही है हीरक
कही कंचन
————-
नुपुर से सज्जित-
पग है, राजित -
घुंगर की ध्वनि
मृदु मद्धिम
————-
स्वर्णिम ये काया
मन में समाया
नायिका सी
सुन्दर है चलन

Friday, October 8, 2010

मरो तो ऐसे ही मरो

मानवता के काम आओ
मनुष्यता तो है तभी
बनो परोपकारी तुम
मानव कहलाओगे तभी

दानकर्म से बड़ा
नही है पुण्य सच है ये
कर्ण है उदाहरण
दिया कवच है दान में

कर्म जो है पर हितार्थ
संकोच ना करो ज़रा
दधीची के ही त्याग से
बना है इंद्रवज्रा

नीलकंठ ने पीया था विष
धरा बचाने को
बुद्ध ने दिया था ज्ञान
हिंसा को तुम त्याग दो

मृत्यु तो है पूर्ण सत्य
पर काम ऐसे ही करो
याद जो करे सभी
मरो तो ऐसे ही मरो 

Friday, September 10, 2010

काली घटा

ये काली घटा ने देखो
  क्या रंग दिखाया
नाच उठा मन मेरा
  हृदय ने गीत गाया

Monsoon Paintings - Desert Palisades by Cheryl Fechtसूखी नदियाँ प्लावित हुई
  जीवन लहलहाया
दादुर,कोयल,तोता,मैना ने
  गीत गुनगुनाया

तप्त धरती शीतल हुई
  बूंदे टपटपाया
धरती ने आसमान को छोड़
  बादल को गले लगाया

रवि ज्योति मंद पड़ा
  मेघ गड़गड़ाया
नृत्य मयूर का देख
ये मन मुस्कराया





ishkiya...badi dhe...

Thursday, September 2, 2010

छोटी सी कविता



मन व्याकुल जियरा बेचैन
बिन तेरे सब जीवन सून
भई ज़िन्दगी मिटटी मोल
क्यों सखी सजन ? नहीं  पेट्रोल

Tuesday, August 31, 2010

मै और मेरी तन्हाई

इस सूने कमरे में है बस
मै और मेरी तन्हाई
दीवारों का रंग पड गया फीका
थक गयी आँखे पर वो न आयी
छवि जो उसकी दिल में समाया
दीवारों पर टांग दिया
तू नही पर तेरी छवि से ही
टूटे मन को बहला लिया
पर क्या करूँ इस अकेलेपन का
बूँद-बूँद मन को रिसता है
उस मन को भी न तज पाऊँ मै
जिस मन में वो छब बसता है
शायद वो आ जाए एक दिन
एकाकी घर संवर जाए
इस निस्संग एकाकीपन को
साथ कभी तेरा मिल जाए

Monday, August 30, 2010

पत्तो से टपकती

पत्तो से टपकती वो बारिश की बूंदे
छन से गिरकर वो खिडकी को चूमे
परदे की ओत में छिपता वो बादल
गरजते-बरसते आसमा में झूमे

धरती भी बन मस्त कलंदर
वो नदियाँ भी बहे जो थे कभी अन्दर
हरी-हरी ज़मी पे मेढ़को का शोर
बाँध पायल जंगल में नाच उठा मोर

कतरा दरिया का बन गया समंदर
नई-नवेली धरती दिखे अति सुन्दर
बरसते बादल को कर लो सलाम
बादल तो चंचल है उसे नही है विराम

जाए कही भी बादल संदेसा ले जाए
बरसो इतना की धरा लहलहाए
मरूभूमि पर भी रखे कृपादृष्टि
लगातार बरसो जहां चाहिए अनवरत वृष्टि

मरू हो जाए शीतल ताप भी कम हो जाए
बंजर धरती भी फसल से लहलहाए
बारिश की बूंदों का अहसान रहेगा
किसानो के चेहरे पर मुस्कान बिखरेगा

among us