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Wednesday, February 8, 2012

नदी के पार....

नदी के पार कोई गाता गीत 
उस स्वर में बसा है मन का मीत 
नदी की लहरों खेतों से उठकर 
आती ध्वनि मन लेता जीत 

होगा इस पार जो लेगा सुन 
इस देहाती गानों का उधेड़-बुन 
इन एकाकी गानों को सुनकर 
मरकर भी जी लेगा पुन-पुन 

भानु-चन्द्र का है आलिंगन 
प्रकाश से भरा है लालिमांगन 
इन गीतों ने छेड़ा है फिर से 
राग-अनुराग का आलापन 

9 comments:

  1. आपकी पोस्ट चर्चा मंच 9/2/2012 पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा मंच-784:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  2. भानु-चन्द्र का है आलिंगन
    प्रकाश से भरा है लालिमांगन
    इन गीतों ने छेड़ा है फिर से
    राग-अनुराग का आलापन ...

    बहुत सुन्दर!!!

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  3. भानु-चन्द्र का है आलिंगन
    प्रकाश से भरा है लालिमांगन
    इन गीतों ने छेड़ा है फिर से
    राग-अनुराग का आलापन

    ....बहुत भावमयी सुंदर रचना...

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  4. भानु-चन्द्र का है आलिंगन
    प्रकाश से भरा है लालिमांगन
    इन गीतों ने छेड़ा है फिर से
    राग-अनुराग का आलापन.

    प्रेम पगी सुंदर अभिव्यक्ति.

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  5. बहुत ही सुन्दर प्यारी रचना...

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  6. सुन्दर एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति.....
    कृपया इसे भी पढ़े-
    नेता- कुत्ता और वेश्या (भाग-2)

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  8. बहुत सुंदर रचना,बेहतरीन भाव अभिव्यक्ति, इस रचना के लिए आभार " सवाई सिंह "

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  9. भानु-चन्द्र का है आलिंगन
    प्रकाश से भरा है लालिमांगन
    इन गीतों ने छेड़ा है फिर से
    राग-अनुराग का आलापन

    बहुत सुन्दर!

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