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Tuesday, November 23, 2010

जब टूटा ये...........

 
जब टूटा ये मिलन मेला 
सोचा रुक न पाएगा 
ये आंसुओं का खेला 
हर दिन इस राह पर 
कितने  फूल माला से 
जाता है झर
न जाने कब आया 
ये विस्मरण का बेला 
दिनों-दिन कठोर हुआ 
ये वक्ष-स्थल , सोचा था -
बहेगा नहीं ये अश्रु जल 
अचानक देख तुझे राह में 
रुदन ये निकला जाए न थमे , 
विस्मरण के तले तले था 
अश्रुजल का खेला 


गुरुदेव की रचना से अनुदित

8 comments:

  1. अपके सुंदर अनुवाद ने गुरूदेव जी की रचना के मौन सौंदर्य को मुखरित कर दिया है. बधाई. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  2. उत्तम अनुवाद। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    विचार::आज महिला हिंसा विरोधी दिवस है

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  3. बहुत ही अच्छा अनुवाद किया है आपने. आभार आपना गुरुदेव जी को पढवाने के लिए.

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